सशक्तिकरण

भारत मे सब से ज्वलंत मुद्दों में से एक नारी, सशक्तिकरण है, कई लोगो ने ये नैतिक भार स्वयंभू, बन कर उठा रखा है।
ये लोग बात करते है नारी शक्ति की अच्छी बात है । लेकिन समस्या ये है कि ये बात बस हवा में दिखती है, जमीन पर नही क्योंकि, अगर आप वाकई करना चाहते है नारी सशक्तिकरण तो आप जंगलों में जाइये, गांव देहात के सुदूर इलाको में जाइये उन्हें सेनेटरी पैड के बारे में जानकारी दे क्योंकि, अभी भी भारत के कई इलाकों में इसे गलत और अजीबोगरीब नज़रिए से देखा जाता है ।

उनका अधिकार बताये और सचेत करे, तब जो होगा उसे क्रान्ती कही जायगी और सारा श्रेय आप को मिलेगा आप के संस्था को मिलेगा ।

लेकिन नही ये बस ब्रा से आज़दी पैंटी से आज़ादी और गुबारों में वीर्य है यही सब मामले उठाएंगे , और उठाने ने में हर्ज नही है क्योंकि जहाँ स्त्री के अधिकार का हनन हो वहाँ चुप होना गलत है , लेकिन ब्रा के साथ तो कभी पैंटी के साथ तो कभी सैनटरी पैड के साथ फ़ोटो खींच अपने फ़ेकबुक एकाउंट पर अपलोड कर देंगे और आप की क्रांति का दायित्व खत्म नही होता है।
अगर आप वाकई इस का भार खुद पर लिया है तो सार्थक प्रयास करिये सशक्तिकरण के लिए।

न कि बेतुके बातो को तूल दे।
अब मामला ये आ जाता है कि ये करते क्यों है तो हो सकता है ये सस्ती लोकप्रियता के लिए करते हो ।
क्योंकि भारत की अपनी मूल सभ्यता है और इसमें भी कई कमी है आप कमी दूर करने के लिए प्रयासरत होइए न कि पूरी संस्कृति को गाली देने के लिए।

आप आज़ादी के लिए हक़दार है लेकिन किस हद तक सारी मूलभूत संरचनाओं को तोड कर के आप आज़ाद होइए लेकिन बुरे परम्परा से न की हर बात को तोड़ मरोड़ के और ओझि बात स नही बल्कि वास्तविक समस्याओं और गलत धारणाओं से ।

Advertisements

नौकरिया डाह

भारत की राज्य बिहार में बेरोजगारी का आलम देखते ही बनता है और युवकों की भीड़ आप पटना के शहरों में देख सकते है।
जो हर सरकारी नौकरी का फर्म बस इसी लालच से डालता है कि शायद इस बार ये नौकरी हाथ लग जाये ।
इस आशाओं को कुछ ज्ञानी और पूँजीपति भुनाने से बाज़ नही आते है।
सब के अपने तरीके है कोई रूम के लिए कोई खाने के नही तो कोई यातयात के लिए सब अपने हिसाब से उन युवकों के मजबूरी का फायदा उठाने से पीछे नही है, मैं ये तो नही कहता कि मुफ्त हो जाये लेकिन इन सब मूल सुविधाओं का मूल्य आसमान छू रहा है,
आखिर में वो एक सपना सजोया लड़का जिससे कई की उम्मीद जुड़ी है बस वो उम्मीद पैसों के आभाव वक़्त के मार और भ्रटाचार के भेंट चढ़ जाता है।
उसके पास घर लौटने और या छोटे काम को कर आजीविका चलाने के अलावा रास्ता नही बच जाता ।
आखिर क्यों हमारी व्यवस्था इतनी खोखली और पूँजीवाद इतना हावी है।
पढ़ाने वाला करोड़ो में रूम वाला लाखो में यातायात वाला भी काफी पैसे जोड़ लेता है और जो नौकरी के सपने में आता है वो ख़लीहर लौट जाता है।
समस्या एक ये भी है कि इसमें एक वर्ग वो भी आते है जो महज मस्ती आनंद के लिए आते है और धन खर्च कर चले जाते है।
उनके लिए तो कोई बात नही पर जो वास्तव में
किसी को फर्क नही पड़ता क्योंकि हर साल ऐसे ही छात्रों की नई फसल चरचराती रहेगी और ये पूंजीवादी के जेब भरती जायगी और नौकरी भ्रटाचार के भेंट चढ़ती रहेगी ।

बलात्कर की समस्या

भारत एक विकासशील पथ पर अग्रसर देश है।
हर कोई की दिनचर्या में अखबार कुछ वक्त के लिए महत्व रखता है।
लेकिन उसमें एक ख़बर जो उभयनिष्ठ खबर जो रोज सुनने में आती है।
“बलात्कर”
आखिर भारत मे हर दिन एक न एक निर्भया कांड दोहराता रह रहा है, या यूं कहें कि उससे भी ज्यादा दरिंदगी सामने आ रही है।
आखिर ऐसा क्या है जो इन्हें उकसा देता हैं, “बलात्कर” करने के लिए।
कुछ लोग दलील देगे की वो रात में निकली थी इसलिए तो कुछ कहेगे की छोटे कपडे थे, तो कोई चरित्र पर सवाल उठायेगा।
लेकिन इन सब मे एक बात है जो हम भूल जाते है कि “बलात्कारी” से ज्यादा बुरा बर्ताव समाज करता है उनके साथ अगर कोई उससे सामान्य व्यहार करें तो उसे भी लोग घृणा की दृष्टि से देखते है।
तो आखिर उनका दर्द कैसे कम हो?
तो लोग बोलेगे क़ानून सज़ा देगा।
मैं पूछता हूं कि जिसके आँखों पर खुद पट्टी बँधी हैं, वो क्या इंसाफ करएगे ?
ख़ैर इसके लिए कोई एक फैक्टर ज़िमेदार नही है । पर इन सब मे मैं दोष केवल व्यक्ति को दूँगा। क्योंकि सोच आप के काबू में है न कि किसी और के हाथ मे, लोग दलील देते है, की शराब के नशे में हो गया , अच्छा क्यों नही अपनी बहन माँ के साथ ऐसा करते है, क्योंकि नही किसी और के घर जाके सो जाते है, क्यों नही अपनी चीज़ खो देते है??
नही क्योंकि ऐसा नही होता ये बस बचने के एक जरिया है, और मैं उन वकील से पूछना चाहता हूं, की क्या आप के घर ऐसा हो जाये , तो भी आप उसकी रिहाई के लिए वक़ालत करगे ।
नही जब तक दर्द खुद का न हो तब तक किसी और का दर्द समझ नही आता इन्हें।
और कुछ लोग सोशल मीडिया और नेटवर्क से इस पर खूब बात करते है, पर जमीन के स्तर पर कुछ नही करते क्योंकि कैमरे के आगे बोलना आसान है करना मुश्किल निर्भया कांड ये भी ज्यादा बुरे और बर्बर बलात्कर मधुबनी में और रोहतक में हुवा वो बस एक पेपर के पन्ने पर आ के सिमट गई क्योंकि वो मामले में मीडिया को trp नही मिली।
अभी हालिया नया मामला जम्मू ये आया कि एक लड़की जो महज 8 वर्ष की थी उसके साथ गैंग रेप किया गया वो भी मंदिर में इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है हिंदुस्तान में ,
और इन सब मे पुलिस अगर कुछ कर भी ले तो राजनीति और धनपशु का दबाव आ जाता है।
कुछ वक़्त में लोग भूल के अपने काम मे मशगूल हो जाते है।
और इसी लिए इनके हौसले बुलंद होते है।
अगर एक को भी बर्बर सज़ा मिल जाये तो सबक होगा कि अगर मैने ऐसा किया तो मुझे भी वैसे ही दर्द से गुजरना होगा।
तब ही जा के हम कुछ हद तक लगाम लगा पायंगे।
अशोक कुमार द्विवेदी “दिव्य”

#दोहरीकरण

#दोहरीकरण

आज आप यूट्यूब खोलेंगे तो कई ऐसे वीडियो मिल जायेगे जिसमे दिल्ली के लोग बिहारी लोगों का मजाक या उनकी पहचान बताते है, गौरतलब है कि हर बड़े इम्तहान को पास कर लेते है ये वाक्य कई बार सुनने को मिल जाता है।
फिर सब अपने अपने नजरिये से बुराई करते है और आख्रिर में बोलते है कि है वो IAS ज्यादा बनते है।
ख़ैर अब मैं आप से ये पूछना चाहता हु की आख़िर फटी जीन्स ब्रांड के कपड़े और लुक पे ध्यान नही देते क्योंकि उनकी आखो में ख्वाब होते है वो भी खुले आँखों मे जिन पे होती है परिवार की उम्मीद पिता की आस माँ की प्राथना बहनों की इच्छा सब जुड़ी होती है।
और कुछ कर गुजरने का जज़्बा उन को खींच लाता है दिल्ली
और हा मैं खुल के बोल सकता हु की बिहारी के वजह से ज्यादातर इंस्टीट्यूट होस्टल पेइंग गेस्ट चल रहे है ।
दिल्ली के अर्थ में बिहार के छात्रों टीचरो और कार्यरत लोगो रिक्शा चालकों और खोखे वालो का अभूतपूर्व योगदान है।
क्योंकि बिहार से आने वाले में ज्यादातर को अपना केवल लक्षय दिखता है।
जिसके लिए वो जी तोड़ मेहनत करता है।
और रही बात दिल्ली की तो दिल्ली की जमीन किसी की भी नही और एक देश के अलग राज्य के लोगो को गलत निगाह से देखना बंद करिये।
बिहार जितना मिट्टी से जुड़ा है उतना है इतिहास इसका गौरवशाली है।
दिल्ली का खुद का क्या परिचय है??
आप घृणा की दृष्टि से किसी भी अन्य राज्य के लोगो को देखना बंद कर दे।
वरना किसी दिन ये एक बड़ा संकट बन के उभरेगा।

मंगरू का प्रेम पत्र

मेरी करेजा”…

वेलेंटाइन बाबा के कसम ई लभ लेटर मैं डेहरी पर चढ़कर लिख रहा हूँ…

डीह बाबा काली माई के कसम आज तीन दिन से मोबाइल में टावरे
नहीं पकड़ रहा था…

ए करेजा”.. रिसियाना मत…

मोहब्बत के दुश्मन खाली हमरे तुम्हरे
बाउजी ही नहीं हैं”….
यूनिनार औ एयरसेल वालें भी हैं”…”….

जब फोनवा नहीं मिलता है तो मनवा
करता है कि गढ़ही में कूद कर जान दे दें….

अरे इन सबको आशिक़ों के दुःख का क्या पता रे”….?

हम चार किलो चावल बेच के नाइट फ्री वाला पैक डलवाये थे…

लेकिन हाय रे नेटवर्क”….कभी कभी तो मन करता है”…

की चार बीघा खेत बेचकर दुआर पर एक टावर लगवा लें”….
आ रात भर तुमसे बतियावें”….

तुमको पता है जब जब सरसो का खेत देखता हूँ न तब तब तुम्हाई बहुते याद आवत है”….

लगता है तुम हंसते हुए दौड़कर मेरे पास आ रही हो….मन करता है ये सरसों का फूल तोड़कर तुम्हारे जूड़े में लगा दूँ”….

आ जोर से कहूं…”आई लव यू करेजा”….

अरे अब गरीब लड़के कहाँ से सौ रुपया का गुलाब खरीदेंगे”…?

जानती हो हवा एकदम फगुनहटा बह रही है… तुम तो घर से निकलती नहीं हो….

यहाँ मटर, चना जौ के पत्ते सरसरा रहे हैं…रहर और लेतरी आपस में
बतिया रहे हैं…..

मन करता है खेत में ही तुम्हारा
दुपट्टा बिछाकर सो जाऊं आ सीधे होली के बिहान उठूँ….

उस दिन चंदनिया के बियाह में तुम आई थी न”….

हम देखे थे तुम केतना खुश थी…

करिया सूट में एकदम फूल गोभी जैसन लग रही थी…”…

तुमको पता है तुमको देखकर हम दू घण्टा नागिन डांस किये थे”…..

बाकी सब ठीके है रात दिन तुम्हारी याद आती है पागल का हाल हो
गया है…..

रहा नहीं जा रहा तेरह को बनारस में
भरती है”….

देखो बरम बाबा का आशीर्वाद रहा तो मलेटरी में भरती होकर तुमसे जल्दी बियाह करेंगे…

हम नहीं चाहते की तुम्हारा बियाह
किसी बीटेक्स वाले से हो जाए”….

और हमको तुम्हारे बियाह में रो रोकर पूड़ी पत्तल गिलास चलाना पड़े….

आगे सब कुशल मंगल है”….. तु आपन खयाल रखना”….

तुमहार आशिक “….
मंगरु”….

सम्मान

भारत में कई विचार मिल जायगे आप को
आम जानो के भी अपनी अपनी विचार होती है
उन में से सब से उभयनिष्ठ विचार है।
पैसा नही इज़्ज़त कमाओ ।
ठीक है सब की अपनी सोच पर जरा सा ध्यान देने वाला कोना ये है कि कोई अगर किसी को इज़्ज़त दे रहा है तो उसके कई कारण हो सकते है।
जरूरी नही को वो इज़्ज़त कमाया है या धन, क्योंकि कभी कभी धनवान को भी इज़्ज़त नही मिलती तो कभी जो इज़्ज़त जिसने कमाई है उसे भी नही मिलती,क्योंकि इज़्ज़त करना सम्मान देना देने वाले पर निर्भर करता है,न कि लेने वाले पर
मान लीजिये को किसी ने खूब इज़्ज़त कमाई और उसको लोग इज़्ज़त नही देते।
और कोई खूब धन कमाया उसे भी लोग इज़्ज़त नही देते क्योंकि हो सकता हैं कि सम्मान देने वाला उसके विचार से प्रेरित न हो ।
कभी कभी लगता है कि भारत मे ऐसे विचार जानबूझकर फैलाया जाता है ताकि आप महत्वाकांक्षी न बने।
#बस_एक_विचार

हिन्दी दिवस का ओझापन

शुभप्रभात मित्रो आज हिंदी दिवस है, सभी हिन्दी बोलने लिखने वालों के लिए बहुत ही खास दिन है आज वो लोग भी हिंदी बोल लेगे थोड़ी बहुत जो भारतीय तो मूल है पर अंग्रज़ी को क्लास समझते है
हिंदी दिवस पर सरकारी स्कूल में निबंध आदि प्रतियोगिता हो भी जाया करती है, पर अंग्रज़ी वाले स्कूल में बामुश्किल ही किसी को पता होता है
वही लोग आज इसके प्रति सम्मान जनक दृष्टि से देख लेगे जो हिंदी बोलने तक मे अपमान समझते है
आज मेट्रो नगरों में आप को कोई भी जॉब करना है तो पहला सवाल ये होता है कि क्या आप को इंग्लिश आती है।
जैसा कि आप जानते है सभी परिवार अपने बच्चे को इंग्लिश स्कूल में नही पढ़ा पाते है,क्योंकि प्रायः ये महंगे होते है।
आज अगर कॉरपोरेट में जॉब नही लगती तो ज्यादातर इंग्लिश की वजह से।
तो आज ये ओझपन क्यों सम्मान का।
हिंदी दिवस को शुभकामनाएं आप को
साथियो।